Sunday, March 22, 2026

Coal Scam: वह ‘धमाकेदार फाइल’ जिसने उजागर किया 1.86 लाख करोड़ का कोयला घोटाला, हिल गई थी काँग्रेस सरकार

P. Sesh Kumar’s book on coal scam: साल 2012 देश में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सत्ता में थी और प्रधानमंत्री थे डॉ. मनमोहन सिंह। देशभर में आर्थिक सुधारों और विकास की चर्चाएं जोरों पर थीं। लेकिन इसी दौरान नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक रिपोर्ट ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया। इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि कोयला खदानों के आवंटन में पारदर्शिता की गंभीर कमी रही, जिसके चलते देश को लगभग 1.86 लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ। यह खुलासा उस समय न केवल संसद में तीखी बहस का कारण बना, बल्कि सरकार की नीतियों और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े कर गया।

इस रिपोर्ट के पीछे छिपी मेहनत, संघर्ष और सच्चाई की खोज की कहानी को हाल ही में भारत के पूर्व ऑडिट महानिदेशक पी. सेश कुमार ने अपनी पुस्तक ‘Unfolded: How the Audit Trail Heralded Financial Accountability’ में विस्तार से उजागर किया है। किताब में उन्होंने बताया है कि किस तरह उनकी टीम ने राजनीतिक दबावों, सरकारी रुकावटों और असहज माहौल के बावजूद सत्य तक पहुंचने का साहस दिखाया और निष्पक्ष जांच को अंजाम दिया।

‘बदबूदार कमरा’ और न झुकने वाला जज्बा (Coal Scam)

नेटवर्क 18 की रिपोर्ट के अनुसार, कुमार ने अपनी किताब में एक ऐसी घटना का ज़िक्र किया है जो पूरे ऑडिट की प्रतीक बन गई। वे बताते हैं कि जब उनकी टीम को कोयला मंत्रालय में ऑडिट के लिए भेजा गया, तो उन्हें एक बेहद छोटा कमरा दिया गया, जो एक बदबूदार शौचालय के ठीक बगल में था।

कुमार लिखते हैं, “शायद हमें हतोत्साहित करने के लिए ही ऐसा कमरा दिया गया था, ताकि हमारा काम रुक जाए। लेकिन हमारी टीम ने ठान लिया था कि बदबू कमरे में हो सकती है, हमारे इरादों में नहीं।” टीम ने अपनी दृढ़ता बनाए रखी — त्योहारों के दिनों में भी काम जारी रखा, पुराने दस्तावेज़ों की खोज की, धूल से अटी फाइलों को खंगाला और उस घोटाले की परतें खोलीं, जिन्हें छिपाने की हर संभव कोशिश की गई थी। कुमार बताते हैं कि उन्होंने 200 से अधिक स्क्रीनिंग कमेटी बैठकों के रिकॉर्ड मांगे, लेकिन केवल 2 या 3 बैठकों के ही दस्तावेज़ उपलब्ध कराए गए। बाकी फाइलें ‘गायब’ कर दी गई थीं। इसके बावजूद, जो सीमित जानकारी मिली, वही पर्याप्त थी यह साबित करने के लिए कि कोयला खदानों का आवंटन बिना किसी ठोस मानक या पारदर्शी प्रक्रिया के किया गया था।

 वह ‘धमाकेदार फाइल’ जिसने सब बदल दिया (Coal Scam)

ऑडिट टीम के लिए असली मोड़ तब आया, जब उन्हें मंत्रालय के भीतर से एक महत्वपूर्ण ‘नीति फाइल’ (Policy File) हाथ लगी। इस फाइल में साल 2004 से संबंधित दस्तावेज़ मौजूद थे, जिनमें कोयला सचिव, कानून मंत्रालय, और यहां तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह — जिन्होंने कुछ समय के लिए कोयला मंत्रालय का कार्यभार भी संभाला था — के हस्तलिखित नोट्स शामिल थे।

फाइल में यह दर्ज था कि साल 2006 में ही कानून मंत्रालय ने कोयला ब्लॉकों की नीलामी की अनुमति दे दी थी, लेकिन इसके बावजूद मंत्रालय ने इस प्रक्रिया को लागू करने में कई वर्षों की देरी की। इस खुलासे ने सरकार के उस तर्क को पूरी तरह कमजोर कर दिया, जिसमें कहा गया था कि नीलामी कानूनी रूप से संभव नहीं थी। यही ‘नीति फाइल’ बाद में कैग (CAG) रिपोर्ट का सबसे मजबूत और निर्णायक सबूत साबित हुई। (Coal Scam)

‘विंडफॉल गेन’, सरकार के ही दस्तावेज़ों से निकला शब्द

कुमार बताते हैं कि रिपोर्ट में प्रयुक्त प्रसिद्ध शब्द ‘विंडफॉल गेन’ यानी अचानक हुई भारी कमाई, CAG द्वारा गढ़ा गया शब्द नहीं था। यह शब्द स्वयं कोयला मंत्रालय की फाइलों से लिया गया था, जहाँ उल्लेख था कि इस तरह का आवंटन निजी कंपनियों को ‘विंडफॉल गेन’ यानी अप्रत्याशित लाभ पहुँचा सकता है। CAG ने केवल इस ‘विंडफॉल गेन’ की मात्रा का आकलन किया, जो लगभग 1.86 लाख करोड़ रुपये निकला। यह कोई काल्पनिक या मनगढ़ंत आंकड़ा नहीं था। इसके लिए उन्होंने 75 में से 57 कोयला ब्लॉकों का विश्लेषण किया, उनमें उपलब्ध खनन योग्य कोयले की मात्रा का अनुमान लगाया, कोल इंडिया लिमिटेड के मूल्य और लागत के आंकड़ों का उपयोग किया और सभी खर्चों को घटाकर वास्तविक लाभ का आकलन प्रस्तुत किया। (Coal Scam)

‘सरकार नाराज़ थी, लेकिन हम झुके नहीं’

CAG की रिपोर्ट सामने आते ही राजनीतिक हलचल मच गई। तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद में रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए, जबकि कई मंत्रियों ने मीडिया में आकर इसे ‘भ्रामक’ और ‘अधूरी’ करार दिया। लेकिन कुमार के अनुसार, इस पूरे विवाद के दौरान CAG ने सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्होंने किसी वाद-विवाद में पड़ने के बजाय अपने तथ्यों और प्रमाणों पर भरोसा बनाए रखा। सरकार के उच्च स्तर से दबाव के बावजूद ऑडिट टीम ने बयानबाज़ी से दूरी रखते हुए सबूतों को स्वयं बोलने दिया। कुमार लिखते हैं, “यह केवल एक रिपोर्ट नहीं थी, बल्कि हमारे लोकतंत्र में जवाबदेही की असली परीक्षा थी।” (Coal Scam)

कुमार की पुस्तक यह भी याद दिलाती है कि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सभी कोयला ब्लॉक आवंटन रद्द कर दिए। इसका अर्थ यह था कि अदालत ने भी प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं को स्वीकार किया। जो रिपोर्ट कभी सरकार को ‘गलत’ प्रतीत होती थी, वही आगे चलकर देश में पारदर्शिता और जवाबदेही की मिसाल बन गई।

‘जवाबदेही राजनीति नहीं, लोकतंत्र का हिस्सा है’

कुमार अपनी किताब के अंत में लिखते हैं — “यह जीत आंकड़ों की नहीं थी, बल्कि उस विचार की थी कि जनता का धन, जनता की निगरानी में ही खर्च होना चाहिए। जवाबदेही राजनीति का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का मूल तत्व है।” उनके शब्दों में, यह कहानी केवल कोयला घोटाले की नहीं, बल्कि एक जर्जर व्यवस्था में ईमानदारी की महक फैलाने की दास्तां है। उस दुर्गंध भरे माहौल से उठी यह ‘पारदर्शिता की मशाल’ देश को यह संदेश दे गई कि जब नीयत साफ हो, तो सच्चाई को कितनी भी कोशिशों के बावजूद दबाया नहीं जा सकता। (Coal Scam)

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