प्रकाश पर्व: धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव का हापुड़ से गहरा जुड़ाव रहा है। जिले के गांव विगास में उन्होंने एक सप्ताह तक निवास किया था। इस दौरान उन्होंने गांव के बाहर लगे एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे लोगों को उपदेश दिया था और सामने स्थित तालाब में स्नान भी किया था। विगास गांव का यह स्थान सिखों के लिए अब एक बड़ा तीर्थ बन गया है। उस स्थान पर अब एक बड़ा स्कूल और गुरुद्वारा बनवाया गया है। हर वर्ष इस स्थान पर बड़ा मेला भी लगता है। बाबा नानक देव यहां से होकर गढ़मुक्तेश्वर में भी गए थे। और वहीं विश्राम करने के बाद लंगर में भी शामिल हुए थे।

हापुड़ जिले के सिंभावली ब्लॉक के गांव विगास में गुरु नानकदेव जी ने जिस स्थान पर एक वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या की थी। वहां आज भी गुरुद्वारे में पेड़ और सरोवर मौजूद है। देश-विदेश के लाखों श्रद्धालु यहां आकर मत्था टेकते हैं। मान्यता है कि यहां पर मौजूद इस ऐतिहासिक वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा अर्चना करने से मनोकामना पूरी होती है।
गांव विगास के गुरुद्वारा प्रबंध समिति के सदस्य सरदार ब्रजपाल सिंह ने बताया कि सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जब देश के भ्रमण पर निकले थे। तो उस दौरान वह सिंभावली के समीप बसे गांव हबिसपुर विगास में भी पहुंचे थे। और गांव के बाहर एक बरगद के वृक्ष के नीचे विश्राम के लिए रुके थे।
उन्होंने वृक्ष के समीप एक सरोवर में स्नान भी किया और वहीं बरगद के पेड़ के नीचे तपस्या की थी । कुछ दिन तक यहां रुकने के बाद वह आगे के लिए निकल गए थे। तभी से यह बरगद का वृक्ष लोगों के लिए पूजनीय हो गया और लोग इस वृक्ष के नीचे पहुंचकर माथा टेकने लगे।
यहां पर आयोजित होने वाले सत्संग व भंडारे में भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। मान्यता है कि गुरु नानक देव जी ने जिस सरोवर में स्नान किया था, उसमें स्नान करने से चर्म रोग समाप्त हो जाता है। गुरु नानक देव के बारे में कहा जाता है कि नानक नाम जहाज है, चढ़े सौ उतरे पार।
विगास में प्रवास करने के बाद गुरु नानक देव जी ऐतिहासिक नगर गढ़मुक्तेश्वर में पहुंचे थे वहां स्थित नक्का कुआं रोड के निकट गुरुद्वारे में भी गए थे। और यहां पर आयोजित लंगर में शामिल में होने के बाद वे आगे के लिए रवाना हो गए थे।
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