Sunday, March 22, 2026

CSE रिपोर्ट: मां के पेट से ही शुरू हो रहा है प्रदूषण का खेल, बच्चों पर बढ़ रहा बीमारियों का बोझ…

CSE रिपोर्ट: वायु प्रदूषण गर्भावस्था में मां को प्रभावित कर भ्रूण को खतरे में डालता है। इससे समय से पहले जन्म, कम वजन और बाद में डायबिटीज जैसी बीमारियां होती हैं। पांच साल से कम बच्चों में फेफड़े कमजोर, दिमागी विकास रुकना (ADHD, कम IQ) और पुरानी बीमारियां होती हैं। भारत में 25% नवजात मौतें प्रदूषण की वजह से हो जाती हैं।

दूषित वायु आज दुनिया की बड़ी समस्या है। यह सिर्फ वयस्कों को ही नहीं, बल्कि गर्भ में पल रहे बच्चे को भी नुकसान पहुंचाती है। जब सांस के माध्यम से गर्भवती मां के भीतर प्रदूषित हवा जाती है, तो बच्चा खतरे में पड़ जाता है। और यही दूषित वायु नवजात शिशुओं, छोटे बच्चों और किशोरों के लिए जीवन भर की बीमारियां लाती है।

खासकर वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) में यह समस्या बहुत गंभीर हो चुकी है। भारत में दुनिया के एक-चौथाई नवजात शिशु पहले महीने में ही मर जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण प्रदूषण है। विज्ञान ने साफ साफ बता दिया है कि प्रदूषण के तत्व कैसे शरीर में प्रवेश करते हैं और अंगों को नुकसान पहुंचाते हैं।

ये सिर्फ सांस संबंधी बीमारियां ही नहीं, बल्कि कई तरह के स्वास्थ्य नुकसान पैदा करता है। सबसे ज्यादा गरीब परिवारों के बच्चे इससे प्रभावित होते हैं। आइए समझते हैं प्रदूषण गर्भ में कैसे बच्चों को प्रभावित करता है?

CSE रिपोर्ट: गर्भावस्था में प्रदूषण: बच्चे का पहला खतरा

मुख्य नुकसान…

  • मृत जन्म (स्टिलबर्थ): बच्चा गर्भ में ही मर जाता है।
  • कम वजन जन्म (लो बर्थ वेट): बच्चा छोटा और कमजोर पैदा होता है।
  • समय से पहले जन्म (प्रीटर्म बर्थ): बच्चा समय से पहले पैदा हो जाता है, जो कमजोर होता ह।

विज्ञान का मानना है कि प्रदूषण मां के फेफड़ों को प्रभावित करता है। जिसके बाद बच्चे तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व कम पहुंचते हैं। गर्भ में ही शिशु के फेफड़ों का विकास रुक जाता है, जिससे बाद में सांस की बीमारियां होने का खतरा बना रहता है। छोटे कण (पार्टिकुलेट मैटर) मां में सूजन पैदा करते हैं, ये मां की रक्षा प्रणाली (इम्यूनिटी) को कमजोर कर देती है।

परिणामस्वरूप संक्रमण का खतरा बढ़ता है और बच्चे का दिमागी विकास (न्यूरोलॉजिकल डेवलपमेंट) खराब होता है। कमजोर बच्चे लोअर-रेस्पिरेटरी इंफेक्शन, दस्त की बीमारियां, दिमाग को नुकसान, सूजन, खून की बीमारियां और पीलिया जैसी समस्याओं से ज्यादा प्रभावित होते हैं। ये बच्चे इन बीमारियों का सामना करने में कमजोर होते हैं।

जीवन भर की बीमारियां: प्रदूषण का लंबा असर

गर्भ में प्रदूषण का सामना करने वाले बच्चे बाद में कई गंभीर बेमारियों कि चपेट में आ जाते हैं। ये हार्मोन और डाइजेशन संबंधी बीमारियां (एंडोक्राइन और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर) पैदा करता है, जैसे डायबिटीज. सांस की सेहत खराब होने से बच्चे के फेफड़े कमजोर पड जाते हैं, जो वयस्क होने पर फेफड़े की बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं।

गरीब घरों में जन्में बच्चे ज्यादा खतरे में हैं क्योंकि उनके पास अच्छा इलाज या साफ हवा नहीं होती, इसलिए नुकसान दोगुना हो जाता है। वैज्ञानिकों ने साफ रास्ते बताए हैं कि दूषित हवा कैसे शरीर में घुसती हैं। नाक से सांस लेते हुए खून में मिल जाती हैं अंगों को नुकसान पहुंचाती हैं। ये सिर्फ सांस की बीमारियां ही नहीं, बल्कि पूरे शरीर पर असर डालता है।

पांच साल से कम उम्र के बच्चों पर खतरा

प्रदूषित हवा से पांच साल से कम उम्र के बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं उनके फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं, इसलिए नुकसान गहरा होता है।

मुख्य प्रभाव…

  • फेफड़ों की कमजोरी: सांस लेने की क्षमता कम हो जाती है। इससे मोटापा (ओबेसिटी) होने का खतरा रहता है।
  • दिमाग का विकास रुकना: ध्यान की कमी हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD), कम बुद्धिमत्ता (रिड्यूस्ड इंटेलिजेंस) और दिमागी विकास में कमी (इम्पेयर्ड न्यूरोडेवलपमेंट) जैसी समस्याएं पैदा होती हैं।
  • कम प्रदूषण भी खतरनाक: थोड़ी मात्रा में भी प्रदूषण फेफड़ों को हमेशा के लिए कमजोर कर देता है। वयस्क होने पर पुरानी बीमारियां होती हैं, जो जीवन की गुणवत्ता बिगाड़ देती हैं।

वैश्विक दक्षिण और भारत: चिंताजनक स्थिति

वैश्विक दक्षिण के देशों में प्रदूषण की समस्या बहुत गहरी है। यहां औद्योगिक धुआं, वाहनों की गैसें और जलावन के धुएं से वायु जहरीली हो जाती है। भारत में ये सबसे बुरा है। यहां दुनिया के 25 प्रतिशत नवजात शिशु पहले महीने में मर जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण प्रदूषण है, जो गर्भ में ही असर शुरूकर देता है।

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