Sunday, March 22, 2026

पिता लगाते हैं कपड़ों की फेरी, बेटी रीत राठौर ने गरीबी की जंजीर तोड़ ऊंची कूद में जीता स्वर्ण पदक, अब कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों पर नजर

मुज़फ्फरनगर जिले के रतनपुरी गांव की बेटी रीत राठौर ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि अगर हौसले बुलंद हों तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं। दक्षिण एशियाई एथलेटिक्स (SAAF) 2025 की सीनियर चैंपियनशिप में झारखंड में आयोजित महिला ऊंची कूद स्पर्धा में 1.76 मीटर की शानदार छलांग लगाकर रीत ने स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इस प्रतियोगिता में बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल, मालदीव सहित नौ देशों के खिलाड़ियों ने भाग लिया था। रीत ने सभी को पछाड़ते हुए भारत का नाम ऊँचा किया। श्रीलंका की खिलाड़ी ने रजत और भारत की ही दूसरी खिलाड़ी ने कांस्य पदक जीता।

संघर्ष से सफलता तक रीत राठौर की कहानी

रीत राठौर की कहानी उन बेटियों की मिसाल है, जो कठिनाइयों के बावजूद अपने सपनों को साकार करती हैं। जनपद मुजफ्फरनगर के रतनपुरी में बंजारा समाज से ताल्लुक रखने वाली रीत एक अत्यंत गरीब परिवार से आती हैं। उनके पिता सतबीर फेरी लगाकर कपड़े बेचते हैं, जबकि उनकी मां घर के कामकाज और मजदूरी कर परिवार का सहारा बनती हैं। परिवार में पांच बहनें और दो भाई हैं, जिनमें रीत तीसरे नंबर की हैं और वर्तमान में कक्षा 12 की छात्रा हैं।

सीमित साधनों के बावजूद रीत ने 2021 में मेरठ के कैलाश प्रकाश स्टेडियम में अपने कोच गौरव त्यागी के मार्गदर्शन में अभ्यास शुरू किया। उनकी मेहनत, अनुशासन और समर्पण ने उन्हें आज इस मुकाम तक पहुंचाया है। रीत अपनी सफलता का श्रेय अपने कोच को देती हैं, जिन्होंने हर कदम पर उनका मार्गदर्शन किया और हिम्मत बढ़ाई।

गांव में हुआ भव्य स्वागत

स्वर्ण पदक जीतने के बाद जब रीत अपने गांव लौटीं, तो गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों ने फूल-मालाओं से उनका स्वागत किया और उन्हें आशीर्वाद दिया। पूरे गांव में गर्व की भावना देखने को मिली, क्योंकि रीत ने न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे समाज का मान बढ़ाया है।

“देश के लिए खेलना ही सबसे बड़ा सपना”

अपनी जीत से उत्साहित रीत कहती हैं, “यह तो बस शुरुआत है। मेरा सपना है कि मैं कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों में भी भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतूं। नौकरी तो बाद में कर लूंगी, अभी तो देश के लिए खेलना है।” रीत के उत्कृष्ट प्रदर्शन को देखते हुए रेलवे और सीआईएसएफ से उन्हें नौकरी के ऑफर भी मिले हैं, लेकिन उन्होंने फिलहाल पूरा ध्यान अपने खेल पर केंद्रित करने का फैसला किया है। रीत राठौर की सफलता यह संदेश देती है कि नारी किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है। आर्थिक कठिनाइयाँ, सामाजिक चुनौतियाँ और सीमित संसाधन भी यदि जज़्बा मजबूत हो तो रुकावट नहीं बनते। रीत जैसी बेटियाँ देश की नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा हैं—जो बताती हैं कि “सपने वही सच होते हैं, जिनके लिए नींद तक कुर्बान करनी पड़े।”

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